भारत में जैविक खेती अनुसंधान: वर्तमान स्थिति और भविष्य की राह
डॉ. के.एल. मौर्य1, चाँदनी कुशवाहा2
1प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष (अर्थशास्त्र), शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय सतना (म.प्र.)
2शोधार्थी (अर्थशास्त्र), शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय सतना (म.प्र.)
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
जैविक खेती एक ज्ञान गहन प्रणाली है और वर्षों से स्वयं चिकित्सकों द्वारा विकसित की गई है। जैविक खेती भारत की मूल है। प्राचीन भारत के किसानों को प्रकृति के अनुकूल खेती प्रणाली और मिश्रित खेती, मिश्रित फसल और फसल रोटेशन जैसी प्रथाओं के लिए जाना जाता है। जैविक खेती के लिए पहला ‘‘वैज्ञानिक’’ दृष्टिकोण ष्बाद के वैदिक कालष्, 1000 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व के वेदों में वापस उद्धृत किया जा सकता है। पिछले 10 वर्षों के दौरान प्रमाणित जैविक खेती के तहत क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2003-04 के दौरान प्रमाणित जैविक खेती के तहत 42,000 हेक्टेयर से कम के साथ, जैविक खेती के तहत क्षेत्र अगले 5 वर्षों के दौरान लगभग 25 गुना बढ़कर 2008-09 के दौरान 1.2 मिलियन हेक्टेयर हो गया। जैविक खेती एक ऐसी प्रणाली है जो पारिस्थितिक क्षति के बिना स्वस्थ और सुरक्षित भोजन प्रदान करती है। इसलिए, सरकार ने जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना (छच्व्थ्), राष्ट्रीय बागवानी मिशन (छभ्ड), पूर्वाेत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए बागवानी मिशन (भ्डछम्भ्), मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता के प्रबंधन पर राष्ट्रीय परियोजना जैसी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा देना शुरू किया। छच्डैभ्.थ्) और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (त्ज्ञटल्)। जैविक खेती को बढ़ावा देने में कई राज्यों की रुचि इंगित करती है कि जैविक कृषि को अन्यथा स्थिर कृषि क्षेत्र के लिए गतिशील परिवर्तन के अग्रदूत के रूप में देखा जा रहा है। पहले और तेजी से प्रगति के बावजूद, जैविक खेती की आर्थिक व्यवहार्यता और पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य लाभों के बारे में आशंका कृषि शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं को परेशान करती रहती है।
KEYWORDS: जैविक खेती, वृक्षायुर्वेद, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना
प्रस्तावना -
परिचय
जैविक खेती कृषि की वह विधि है जो संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों के अप्रयोग या न्यूनतम प्रयोग पर आधारित है तथा जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिये फसल चक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करती है। सन् 1990 के बाद से विश्व में जैविक उत्पादों का बाजार काफ़ी बढ़ा है।
जैविक खेती की परिभाषा
ऐसी खेती जिसमें दीर्घकालीन व स्थिर उपज प्राप्त करने के लिए कारखानों में निर्मित, रसायनिक उर्वरकों, कीटनाशियों व खरपतवारनाशियों तथा वृद्धि नियन्त्रक का प्रयोग न करते हुए जीवांशयुक्त खादों का प्रयोग किया जाता है तथा मृदा एवं पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण होता है, कहलाती है।
हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है एवं पुरातन काल से ही यहाँ खेती का कार्य हो रहा है। हरित क्रांति के पूर्व देखा जाय तो जो भी कृषि पद्धति हमारे यहाँ प्रचलित थीं वह जैविक खेती पर आधारित थी लेकिन समय की आवश्यकता एवं जरूरतों के अनुरूप कृषि पद्धति में बदलाव हुआ। जिसके कारण कृषि पद्धति में रसायनों का आगमन हुआ इस परिवर्तन के चलते पौध पोषक तत्वों की आपूर्ति के लिए विभिन्न कार्बनिक पदार्थों के उपयोग में निरंतन गिरावट आयी। परिणामस्वरूप मृदा (मिट्टी) की रसायनिक, भौतिक एवं जैविक गुणों में भी गिरावट हुई ।
भारत जैसे विकासशील देश में अधिकतम् कृषि उपज प्राप्त करने के लिए भूमि की उर्वरा शक्ति को उच्च स्तर पर बनाये ’रखना नितांत आवश्यक प्रतीत होता है उर्वरकों और खादों के उपयोग द्वारा मिट्टी की उर्वरा शक्ति का संरक्षण तथा पौधों की पोषक तत्वों की पूर्ति की जाती है। हमारे देश मे बहुत से किसान ऐसे है जो आज भी उर्वरकों का प्रयोग करने में असमर्थ हैं ऐसे किसानों के खेतों की मिट्टी की उर्वरा शक्ति के संरक्षण एवं सुधार के लिए जैव पदार्थ तथा जैविक खाद ही एक मात्र सहारा है)। आज जो किसान उर्वरकों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे है वे भी दिनों दिन मृदा उर्वरता संबंधी उत्पन्न नयी समस्याओं विशेषतया गंधक और जस्ते जैसे गौण तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की न्यूनता की समस्याओं के कारण उर्वरकों के अधिकाधिक प्रयोग के प्रति हतोत्साहित हो रहे है। इन परिस्थितियों मे हमें ऐसे विकाल्पों की खोज करनी है जो कि न्यूनतम मात्रा मे पौधो के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों की पूर्ति कर सके। यहां यह उल्लेखनीय है कि जैव सामग्री एवं जैविक खादों के समुचित प्रयोग द्वारा काफी हद तक इस समस्या से निपटा जा सकता है। आवश्यक मात्रा में जैविक खादों का हस्तेमान करने से प्रमुख पोषक तत्वों के साथ ही साथ गौण एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति हो जाती है। इसलिए जैविक खाद का प्रयोग करते रहने से गौण तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी की समस्या अचानक उत्पन्न नही होती ।
पोषक तत्वों की पूर्ति के अलावा जैविक खादों के कई लाभ है। इनके हस्तेमान से मिट्टी की उत्पादकता में प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से वृद्धि होती है । जिसका मूल्यांकन मिट्टी के भौतिक, रसायनिक तथा जैविक गुणों में होने वाले परिवर्तनों द्वारा आसानी से किया जा सकता है । जैविक खादों के प्रयोग से मिट्टी के पोषक तत्वों की धारण तथा पूर्ति करने की क्षमता बढ जाती है साथ ही मिट्टी में जैविक सामग्री का समावेश हो जाता है जिसके फलस्वरूप मिट्टी की भौतिक रचना में सुधार, जल शोषण, जल धारण सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि हो जाती है इसके अलावा मिट्टी की क्षार विनिमय क्षमता तथा उभय प्रतिरोधिता जैसे गुणों तथा भूक्षरण रोधी शक्ति मे भी सुधार होता है। उल्लेखनीय है कि जैव सामग्री के विघटन के फलस्वरूप उत्पन्न कार्बन डाई आक्साईड का जल से संयोग होने पर कार्बनिक अम्ल का निर्माण होता है जो मिट्टी में उपस्थित फास्फोरस जैसे तत्वों को पौधों के लिए उपलब्ध बनाता है। जैविक खाद के प्रयोग से उर्वरक नाईट्रोजन की क्षमता में भी वृद्धि होती है। क्योकि उनके प्रयोग से पौधे को नाइट्रोजन अपेक्षाकृत मंद गति से उपलब्ध होता है। इसलिए नाईट्रोजन की हानि कम होती है। हमारे देश की मिट्टियों में जीवांश पदार्थ की व्यापक कमी होने तथा मृदा उर्वरता संरक्षण में भी जैव खादों का अमूल्य योगदान होने से इन खादों का महत्व और भी स्पष्ट हो गया भारत में किये गये अनुसंधानों में यह ज्ञात हुआ है कि जैविक खादें यद्यपि उर्वरकों का शत-प्रतिशत स्थान नहीं लें सकती किन्तु उर्वरकों तथा जैविक खादों के संयुक्त प्रयोग द्वारा उर्जा की कमी की स्थिति तथा उर्वरकों की बढ़ती कीमतों की समस्या से कुछ हद तक राहत अवश्य मिल सकती है।
जैविक खादों के गुण
1 कम लागतः जैविक खादें व जैविक कीट तथा खरपतवार नाशी रसायनिक उर्वरकों आदि की तुलना में कम खर्च (लगभग 75-85 प्रतिशत) में तैयार किया जा सकते है ।
2 स्थानीय उपलब्धताः जैविक कृषि उत्पादों की उपलब्धता ग्राम स्तर पर ही हो सकती है स्थानीय संशाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से जैविक खादें आसानी से तैयार की जा सकती है।
3 सुग्राहिताः विषहीन, प्रदूषण मूलक, प्राकृतिक संसाधनो से तैयार की गयी जैविक खादें आसानी से तैयार की जा सकती हैं जैविक खादें पर्यावरण मित्रवत होती है ।
4 उत्पादकताः जैविक खादों से उत्पादित पदार्थों की गुणवत्ता, पौष्टिकता एवं प्रति यूनिट उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है ।
5 पोषणीयताः जैविक खादों के संतुलित प्रयोग से मृदा की भौतिक, रसायनिक एवं जैविक संरचना में गुणोत्तर वृद्धि होती है। जैविक उत्पाद अधिक स्वस्थ्यवर्धक होते है। कार्बनिक उत्पादों में विटामिन सी लगभग 40 प्रतिशत से अधिक होती हैं
6 विविधीकरणः जैविक व स्थानीय कृषि तकनीक से समन्वित कृषि का विकास होता है जैविक खेती, जैव विभिन्नता व विविधीकरण के संतुलित विकास में सहायक होती है ।
7 किसानी मित्रवतः कम लागत, स्थानीय निर्माण व उपयोगिता के विभिन्न स्वरूप जैविक खादों को किसानों के लिए मित्रवत बनाते हैं। जैविक खाद से मृदा में जल धारण क्षमता, पी. एच. मान. जीवाश्म का अनुपात आदि में बढोत्तरी होती है ।
8 आय में वृद्धि: जैविक खाद में कम लागत व गुणोत्तर उत्पादन में सकल आय में बढोत्तरी होती है।
9 निर्यात में प्रोत्साहनः जैविक कृषि उत्पादों की बिक्री व निर्यात में प्रोत्साहन तो मिलता ही है कृषि उत्पादों पर बाजार में 30-40 प्रतिशत अधिक मूल्य भी मिलता है।
10 खरपतवार व कीट प्रबंधनः जैविक खादों के नित्य प्रयोग से रसायनिक विधा की खेती बारी की तुलना में खरपतवार व कीडों के प्रकोप में कमी आती है फलतः रसायनिक खरपतवार व कीटनाशी पर खर्च तथा उनसे विभिन्न हानिकारक आयाम जैसे-मित्र कीटों में कमी, प्रदूषण, खाद्य श्रंखला में विष का प्रयोग आदि से भी बचा जा सकता है
11 भण्डारण क्षमताः जैविक खदों के प्रयोग से उत्पादित कृषि उत्पादनों में भण्डारण क्षमता तुलनात्मक रूप से लगभग 30-40 प्रतिशत अधिक होती है।
जैविक खेती एवं भूमि उर्वरता
रसायनिक उर्वरकों की अनुपस्थिति में यह निर्धारित किया गया है। कि पीथ पोषण एवं भूमि उर्वरता के लिए निम्न तथ्यों पर ध्यान देना आवश्यक है-
1- प्राकृतिक खनिजों का उपयोग ।
2- जैविक विधियों द्वारा नत्रजन स्थिरीकरण ।
3- कृषि अवशेषों का उपयोग कर पोषक तत्वों का पुर्नचक एवं कार्बनिक खादों का असरकारक उपयोग एवं
4- भूमि की जैविक गतिविधियों को बढ़ावा देना। मध्यप्रदेश में उपलब्ध कार्बनिक पदार्थो की मात्रा एवं उनसे. उपलब्ध पौध तत्व (1000 टन)
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कार्बनिक पदार्थों के उपयोग से दो मुख्य दिशाओं में अच्छे परिणाम मिलेंगे ।
अ. जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा, उन क्षेत्रों की फसल उत्पादकता में वृद्धि होगी ।
ब. जिन क्षेत्रों में कृषि रसायनों का प्रचन है वहाँ कार्बनिक उर्वरकों के समन्वयन से मृदा उर्वरता में वृद्धि कर और अधिक फसल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है जिससे खाद्यान की आवश्यकता के अनुरूप संतुलन बना रहेगा ।
जैविक खेती भारत की मूल है। प्राचीन भारत के किसानों को प्रकृति के अनुकूल खेती प्रणाली और मिश्रित खेती, मिश्रित फसल और फसल रोटेशन जैसी प्रथाओं के लिए जाना जाता है। जैविक खेती के लिए पहले ‘‘वैज्ञानिक’’ दृष्टिकोण को ष्बाद के वैदिक कालष्, 1000 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व (रंधावा, 1986;और परेरा, 1993) के वेदों में वापस उद्धृत किया जा सकता है। सार प्रकृति के शोषण के बजाय साझेदारी में रहना है। इस संबंध में, ‘‘वृक्षयुर्वेद’’ (पौधों का विज्ञान), ‘‘कृषिशास्त्र’’ (कृषि का विज्ञान) और ‘‘मृगयुर्वेद’’ (पशु विज्ञान) मुख्य कार्य हैं (महले और सोरे, 1999)। जैविक आंदोलन मुख्य रूप से सर अल्बर्ट हॉवर्ड के काम के लिए जिम्मेदार है, जिन्हें अक्सर आधुनिक जैविक कृषि के जनक के रूप में जाना जाता है, जिनका मानना था कि फसल उत्पादन के प्रकृति के तरीकों से नए तरीकों को अपनाने से मिट्टी की उर्वरता का नुकसान होता है (हावर्ड), 1943)। 1905 से 1924 तक, उन्होंने भारत में एक कृषि सलाहकार के रूप में काम किया, जहाँ उन्होंने पारंपरिक भारतीय कृषि पद्धतियों का दस्तावेजीकरण किया और उन्हें अपने पारंपरिक कृषि विज्ञान से श्रेष्ठ माना। उनका शोध और इन विधियों का और विकास उनके लेखन में दर्ज है, विशेष रूप से उनकी पुस्तक एन एग्रीकल्चरल टेस्टामेंट में। यह अग्रणी कार्य है जिसने भारत में जैविक आंदोलन के बीज बोए, रासायनिक उर्वरकों के पूर्ण बहिष्करण के लिए खाद और पौधों के पोषक तत्वों के अन्य जैविक स्रोतों के उपयोग पर अधिक जोर दिया।
पिछले 10 वर्षों के दौरान प्रमाणित जैविक खेती के तहत क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2003-04 के दौरान प्रमाणित जैविक खेती के तहत 42,000 हेक्टेयर से कम के साथ, जैविक खेती के तहत क्षेत्र अगले 5 वर्षों के दौरान लगभग 25 गुना बढ़कर 2008-09 के दौरान 1.2 मिलियन हेक्टेयर हो गया। हालांकि, बाद में प्रमाणित जैविक खेती के तहत क्षेत्र में 0.78-1.1 मिलियन हेक्टेयर के बीच उतार-चढ़ाव आया। वर्तमान में, लगभग 0.5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र प्रमाणित जैविक खेती के तहत है और भारत जैविक खेती के तहत कुल भूमि के मामले में 16वें स्थान पर है और कुल कृषि क्षेत्र (विलर और जूलिया, 2014) में जैविक फसलों के तहत कृषि भूमि के लिए 92वें स्थान पर है। 2012-13 के दौरान, भारत में लगभग 0.6 मिलियन के जैविक उत्पादकों की सबसे बड़ी संख्या थी और 1.24 मिलियन टन प्रमाणित जैविक उत्पाद के लिए जिम्मेदार था। भारत ने 2013-14 के दौरान 16322 मीट्रिक टन जैविक वस्त्र सहित 194088 मीट्रिक टन की कुल मात्रा के साथ 135 उत्पादों का निर्यात किया। जैविक कृषि-निर्यात प्राप्ति लगभग 403 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी, जिसमें 183 अमेरिकी डॉलर जैविक वस्त्र शामिल थे, जो पिछले वर्ष की तुलना में 7.73ः की वृद्धि दर्ज करता है।
जैविक खेती पर शोध
कृत्रिम आदानों के गहन उपयोग के बाद वर्तमान व्यावसायिक कृषि प्रणालियों के कारण मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी पर लगातार बढ़ते नकारात्मक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए, शोध और नीति निर्माताओं को खेती के वैकल्पिक तरीके खोजने के लिए मजबूर किया जाता है (रामंजनेयुलू और अन्य, 2013)। जैविक खेती एक ऐसी प्रणाली है जो पारिस्थितिक क्षति के बिना स्वस्थ और सुरक्षित भोजन प्रदान करती है। इसलिए, सरकार ने जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना (छच्व्थ्), राष्ट्रीय बागवानी मिशन (छभ्ड), पूर्वाेत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए बागवानी मिशन (भ्डछम्भ्), मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता के प्रबंधन पर राष्ट्रीय परियोजना जैसी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा देना शुरू किया। छच्डैभ्-थ्) और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (त्ज्ञटल्)। इसके अलावा, कई राज्यों की सरकारी एजेंसियां या तो जैविक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने या जैविक नीतियों के निर्माण में शामिल हैं। जैविक खेती को बढ़ावा देने में कई राज्यों की रुचि इंगित करती है कि जैविक कृषि को अन्यथा स्थिर कृषि क्षेत्र के लिए गतिशील परिवर्तन के अग्रदूत के रूप में देखा जा रहा है।
पहल और तेजी से प्रगति के बावजूद, जैविक खेती की आर्थिक व्यवहार्यता और पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य लाभों के बारे में आशंका कृषि शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं को परेशान करती रहती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (प्ब्।त्) ने 2003-04 में कृषि प्रणाली अनुसंधान निदेशालय (च्क्थ्ैत्), मोदीपुरम के तहत विभिन्न फसलों की उत्पादकता, लाभप्रदता, स्थिरता, गुणवत्ता और इनपुट उपयोग-दक्षता का अध्ययन करने के लिए जैविक खेती पर एक नेटवर्क परियोजना शुरू की। विभिन्न कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में जैविक खेती के तहत प्रणाली। इस परियोजना में देश भर के 13 अनुसंधान केंद्र भाग ले रहे हैं। इसी तरह, भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल के तहत जैव उर्वरकों पर अखिल भारतीय नेटवर्क परियोजना (।प्छच्ठ) विविध फसल प्रणालियों के लिए मिश्रित जैव उर्वरकों के निर्माण और परीक्षण और गुणवत्ता, वाहक, संघ और वितरण के विशेष संदर्भ के साथ जैव उर्वरक प्रौद्योगिकी में सुधार करने के लिए अनिवार्य है। सिस्टम। कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, धारवाड़ (कर्नाटक) ने राज्य में जैविक किसानों और अन्य हितधारकों की जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से 2006 में जैविक खेती संस्थान की स्थापना की। इसी तरह, 2006 में, कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बैंगलोर (कर्नाटक) ने जैविक कृषि उत्पादों के दावों को वैज्ञानिक रूप से मान्य और विश्लेषण करने और इसे लोकप्रिय बनाने में मदद करने के लिए शिमोगा में जैविक खेती अनुसंधान केंद्र और नागनहल्ली (मैसूर के पास) में जैविक खेती अनुसंधान केंद्र की स्थापना की। किसान। जैविक कृषि विभाग की स्थापना ब्ैज्ञभ्च्ज्ञट, पालमपुर (हिमाचल प्रदेश) द्वारा 2009 में राज्य में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए एक विशिष्ट जनादेश के साथ की गई थी। इसके अलावा, कई आईसीएआर संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों ने स्थान-विशिष्ट जैविक खेती मॉड्यूल विकसित करने के लिए कई शोध परियोजनाएं या केंद्र शुरू किए हैं।
इनमें से कुछ अध्ययनों के प्रमुख निष्कर्ष (ऑन-फार्म और ऑन-स्टेशन दोनों) हैं &
· आम तौर पर किसानों को सिंथेटिक इनपुट को छोड़ने और अपने संचालन को पारंपरिक प्रणालियों से जैविक उत्पादन में बदलने के बाद उपज में कुछ नुकसान का अनुभव होता है। मिट्टी में पूर्ण जैविक गतिविधि की बहाली से पहले, कीट दमन और उर्वरता की समस्याएं आम हैं। उपज हानि की डिग्री अलग-अलग होती है और खेत की अंतर्निहित जैविक विशेषताओं, किसानों की विशेषज्ञता, पिछले प्रबंधन के तहत सिंथेटिक इनपुट का उपयोग करने की सीमा और प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, पारंपरिक उपचार (गोपीनाथ एट अल, 2008) की तुलना में गेहूं की अनाज की उपज जैविक प्रबंधन के तहत स्पष्ट रूप से कम थी (संक्रमण के पहले और दूसरे वर्ष में क्रमशः 36-65ः और 23-54ः कम)। इसी तरह, 2 साल की रूपांतरण अवधि (गोपीनाथ एट अल, 2011) के दौरान पारंपरिक प्रबंधन की तुलना में जैविक प्रबंधन के तहत शिमला मिर्च और फ्रेंच बीन की पैदावार काफी कम (क्रमशः 25.2-45.9ः और 29.5-46.2ः) थी।
· रूपांतरण अवधि के बाद, जैविक कृषि आम तौर पर समान या महत्वपूर्ण रूप से उच्च पैदावार पैदा करती है और पारंपरिक कृषि की तुलना में कम बाहरी निवेश की आवश्यकता होती है। जैविक खेती पर नेटवर्क परियोजना के माध्यम से कई क्षेत्र-विशिष्ट फसल प्रणालियों की पहचान की गई है, जिन्होंने उपज और अर्थशास्त्र (गिल और प्रसाद, 2009) के मामले में पारंपरिक फसल के मुकाबले या तो बेहतर प्रदर्शन किया है।
· 2008-09 के दौरान महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु (पुडुचेरी सहित), केरल और उत्तराखंड में किए गए एक सर्वेक्षण में 50 प्रमाणित जैविक फार्मों और 50 तुलनीय पारंपरिक खेतों को शामिल करते हुए पता चला कि जैविक खेती, फसल उत्पादकता में 9.2ः की कमी के बावजूद, पारंपरिक खेती की तुलना में किसानों को 22.0ः अधिक शुद्ध लाभ प्रदान किया। यह मुख्य रूप से प्रमाणित जैविक उत्पादों के लिए प्रीमियम मूल्य (20-40ः) की उपलब्धता और खेती की लागत में 11.7ः की कमी के कारण था। ऐसे मामलों में, जहां ऐसे प्रीमियम मूल्य उपलब्ध नहीं थे और खेती की लागत मुख्य रूप से गैर-कृषि आदानों की खरीद के कारण अधिक थी, जैविक खेती को आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं पाया गया था (रमेश एवं अन्य, 2010)। इसी तरह, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और उत्तराखंड में किए गए एक अन्य अध्ययन में 120 प्रमाणित जैविक खेतों और 120 पारंपरिक खेतों को शामिल किया गया, यह पाया गया कि जैविक खेती ने तीनों राज्यों में शुद्ध मार्जिन को प्रभावित किए बिना इनपुट लागत को कम कर दिया। ज्यादातर मामलों में जैविक खेती उत्तराखंड और तमिलनाडु में उपज के मामले में पारंपरिक खेती के बराबर थी। हालांकि, मध्य प्रदेश में जैविक खेती के तहत उपज कम थी, जहां खेतों ने नकदी फसल उत्पादन (कपास) पर ध्यान केंद्रित किया। जबकि चावल और गेहूं की उपज आम तौर पर जैविक प्रणालियों के तहत कम थी, इंटरक्रॉपिंग खाद्य फसलों से उपज आम तौर पर अधिक थी (पन्नीरसेल्वम एट अल, 2011)।
· मध्य भारत में 60 जैविक और 60 पारंपरिक कपास के खेतों की तुलना से पता चला है कि जैविक क्षेत्रों में कपास की औसत पैदावार पारंपरिक खेतों की तुलना में 4-6ः अधिक थी। मुख्य रूप से इनपुट के लिए 40ः कम लागत के कारण जैविक कपास में परिवर्तनीय उत्पादन लागत 13-20ः कम थी। कपास की थोड़ी अधिक पैदावार, 20ः जैविक मूल्य प्रीमियम और कम उत्पादन लागत के कारण, जैविक कपास के खेतों में सकल मार्जिन 30-43 अधिक था। इसके अलावा, कई किसानों ने देखा कि उन्हें सिंचाई के कम दौर की आवश्यकता होती है और यह कि जैविक कपास लंबे समय तक सूखे को झेल सकता है (आईहॉर्न एट अल., 2009)।
· देश भर में किए गए कई अध्ययनों ने स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि जैविक प्रबंधन के तहत मिट्टी की गुणवत्ता में विभिन्न मापदंडों के संदर्भ में सुधार होता है, जैसे - भौतिक, रासायनिक, जैविक गुण, स्थूल- और सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता, जैविक खेती प्रणालियों में मिट्टी के स्वास्थ्य और फसल उत्पादन की स्थिरता को दर्शाता है (साहा और अन्य, 2008 ;गोपीनाथ और अन्य, 2011 ;सुरेखा और अन्य, 2013 ;और दुबे और दत्त, 2014)।
· सात राज्यों (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और राजस्थान) में 376 किसानों (199 जैविक और 177 अजैविक किसान) को शामिल करते हुए एक व्यापक सर्वेक्षण में, लागत-लाभ विश्लेषण ने भारत में जैविक खेती के अनुकूल अर्थशास्त्र का संकेत दिया (प्रताप और वैद्य, 2009)। जहां तक जैविक खेती का संबंध है, 7 में से 5 राज्यों में किसान बेहतर स्थिति में थे। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में प्रतिफल अधिक था। सीमित अल्पकालिक शोध निष्कर्षों से यह स्पष्ट है कि कई फसलें विशेष रूप से 2-3 वर्षों की प्रारंभिक रूपांतरण अवधि के बाद जैविक प्रबंधन के लिए बेहतर प्रतिक्रिया देती हैं। जैविक खेती छोटे धारकों की आजीविका में सुधार करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है क्योंकि यह उच्च आय उत्पन्न करती है और इसमें जोखिम कम होता है।
भविष्य की राह
जैविक खेती एक ज्ञान गहन प्रणाली है और वर्षों से स्वयं चिकित्सकों द्वारा विकसित की गई है। कई लेखकों ने जैविक खेती पर काम करने वाले वैज्ञानिकों के सामने आने वाली पिछली कठिनाइयों और व्यापक अनुसंधान समुदाय में स्वयं अनुसंधान और वैज्ञानिकों दोनों की स्वीकृति पर विचार किया है। हालांकि कई आईसीएआर संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों ने जैविक खेती पर शोध शुरू किया है, लेकिन साहित्य में जैविक और पारंपरिक कृषि की तुलना का बोलबाला है। कई शोध योग्य मुद्दे हैं और अधिक उभरने की संभावना है क्योंकि शोधकर्ता इसका पता लगाना शुरू करते हैं। इनमें से कुछ में शामिल हैं:-
विभिन्न देशों के निर्यात मानकों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न फसलों, वाणिज्यिक फसलों, सब्जियों, मसालों, सुगंधित फसलों और अन्य बागवानी फसलों में पर्यावरण के अनुकूल और किफायती जैविक पैकेज विकसित और लोकप्रिय किए जाने हैं।
• जैविक पैकेजों के विकास के लिए बहु-विषयक अनुसंधान दृष्टिकोण का सख्ती से पालन किया जाना है
• जैविक खेती के लिए पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों सहित संभावित क्षेत्रों या क्षेत्रों का चित्रण, कम या कोई रासायनिक इनपुट उपयोग वाले क्षेत्रों के निकटस्थ ब्लॉकों की पहचान करके और जहां किसानों को समूह प्रमाणीकरण सक्षम करने के लिए अनुमत इनपुट का उपयोग करके उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
• शुष्क, अर्द्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में रासायनिक इनपुट उपयोग के स्तर, चयनित वस्तुओं में उत्पादकता के बारे में एक देशव्यापी सर्वेक्षण या सूचीकरण करें, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में मूल्य प्रीमियम प्राप्त करने की क्षमता हो।
• जैविक खेती पर स्वदेशी तकनीकी ज्ञान का सर्वेक्षण, प्रलेखन और महत्वपूर्ण मूल्यांकन।
• जैविक खेती के लिए अभ्यासों के पैकेज के विकास के लिए अंतर-अनुशासनात्मक और स्थान-विशिष्ट अनुसंधान शुरू किया जाना है। जैविक उत्पादन पैकेज प्रथाओं के अकार्बनिक पैकेज की तुलना में अधिक स्थान-विशिष्ट होंगे क्योंकि इनपुट उपयोग काफी हद तक स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करता है।
• इष्टतम उत्पादकता, गुणवत्ता और कीट प्रतिरोध के लिए मौजूदा पूल से उपयुक्त किस्मों की पहचान
• अलग-अलग कार्बनिक स्रोतों के संयोजन और अकेले में पोषक तत्व जारी करने के पैटर्न को समझें।
• खेत में जैविक खाद के उत्पादन के साथ-साथ घरेलू, कृषि और औद्योगिक कचरे से खाद के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए लागत प्रभावी प्रौद्योगिकियों का विकास।
• जैविक खेती के संचालन के लिए उपयुक्त मशीनों, औजारों और मशीन या बैल चालित उपकरणों का विकास जैसे कि खाद स्प्रेडर, मैकेनिकल निराई मशीन, बहु-फसल बुवाई और रोपण आदि के लिए बीज ड्रिल।
• विभिन्न प्रबंधन स्तरों और कृषि-जलवायु परिस्थितियों के तहत विभिन्न फसलों की उपज, गुणवत्ता, अर्थशास्त्र और कटाई के बाद के पहलुओं पर पर्याप्त वैज्ञानिक जानकारी का सृजन।
• जलवायु परिवर्तन को कम करने में जैविक कृषि की भूमिका और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के लिए जैविक खेती की क्षमता का अध्ययन करें
• ऐसे तरीकों का विकास करना जो उत्पादन प्रणालियों को उत्पाद की गुणवत्ता और उसके बाद पशुधन और मानव स्वास्थ्य और कल्याण दोनों से जोड़ते हैं।
निष्कर्ष
पिछले 10 वर्षों के दौरान प्रमाणित जैविक खेती के तहत क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2003-04 के दौरान प्रमाणित जैविक खेती के तहत 42,000 हेक्टेयर से कम के साथ, जैविक खेती के तहत क्षेत्र अगले 5 वर्षों के दौरान लगभग 25 गुना बढ़कर 2008-09 के दौरान 1.2 मिलियन हेक्टेयर हो गया। सीमित अल्पकालिक शोध निष्कर्षों से यह स्पष्ट है कि कई फसलें विशेष रूप से 2-3 वर्षों की प्रारंभिक रूपांतरण अवधि के बाद जैविक प्रबंधन के लिए बेहतर प्रतिक्रिया देती हैं। जैविक खेती छोटे धारकों की आजीविका में सुधार करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है क्योंकि यह उच्च आय उत्पन्न करती है और इसमें जोखिम कम होता है।
जैविक स्रोतों से प्राप्त पोषक तत्वों द्वारा जो कृषि उत्पाद मिलता है वह उत्तम है प्रदूषण रहित है, गुणवत्ता वाला होता है, भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है, प्राकृतिक स्रोतों को संरक्षण मिलता है, प्रकृति से मैत्री पूर्ण व्यवहार होता है ये बातें अच्छी खेती का मूल आधार हैं।
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Received on 30.01.2023 Modified on 23.02.2023 Accepted on 20.03.2023 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2023; 11(1)23-30. DOI: 10.52711/2454-2679.2023.00004 |